
Dear Friends,आप सब को भगत सिंह के जनम दिन की हार्दिक बधाई हो
भगत सिंह ब्रिटिश समराज्यवाद विरोधी मुक्ति संघर्ष के समस्त नायको में अगरनी रहे है जिन्होंने स्वतंत्रता की बलि वेदी पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया. आज़ादी के दीवानों की यादे आज भी करोडो भारतीयों के दिलो में जिन्दा है. आज़ादी के बाद जहाँ सता धारियों ने शहीदों के बलिदान को भुलाने की कोशिश की वहीँ दूसरी तरफ उनके बारे में भरम फैलाने की भी कोशिश की. यही कारण है की देश की अधिकांश जनता अमर शहीद सरदार भगत सिंह के विचारो से आज भी अनजान है.मात्र २३ वर्ष की अल्पायु में ही फांसी के फंदे को चूमने वाले भगत सिंह के विचार सदियों से भारतीय समाज में चली आ रही समस्याओं को समझने की अन्तर दृष्टि तो प्रदान करते ही है साथ ही साथ पूंजीवादी-साम्राज्यवादी षड्यंत्र को भी तार-तार करते हैं. एक जज्बाती इन्क़लाबी क्रन्तिकारी के रूप में अपनी राजनैतिक जिन्दगी की शुरुआत करने वाले भगत सिंह अपने आरंभिक अस्पष्ट विचारो को चंद वर्षो में ही गहन वैज्ञानिक तथा प्रखर विचारधारा में ढालते चले गये. उनकी वैचारिक यात्रा को उनके पत्रों तथा लेखो के माध्यम से समझा जा सकता है.27 सितम्बर १९०७ को लाहौर जिले के बंगा गाँव में एक देशभक्त परिवार में जन्मे भगत सिंह ने नेशनल कॉलेज लाहौर से उच्च शिक्षा प्राप्त की. अपने कॉलेज जीवन से ही भगत सिंह क्रन्तिकारी आन्दोलन से जुड़ गए थे. सिखने और पढने की लगन के कारण उन्होंने छोटी से उम्र में ही रूस की क्रांति, भारतीये इतिहास, समाजवादी विचारधारा से समबधित साहित्य को पढ़ डाला. उनमे पढने की लालसा इस हद तक थी की फांसी से कुछ समय पहले तक भी वो लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे. एक बुद्धिजीवी के रूप में वो अपने साथियों से कंही ऊँचे थे. वे मात्र पढ़ते ही नहीं थे बल्कि अनेक विषयों पर लिखते भी थे. मात्र २३ वर्ष की आयु में ही उन्होंने राजनीति, धर्म, ईश्वर, प्रेम, कला, भाषा, संस्कृति आदि अनेक विषयों पर अपने विचार व्यक्त किये. जब भगत सिंह क्रांतिकारी दल के सक्रिए सदस्य बने तब लोग क्रांति को खुनी संघर्ष मानते थे. परन्तु भगत सिंह ने अपने विचरो के आधार पर इन धारणाओ को गलत साबित किया. उनके अनुसार " क्रांति के लिए खुनी लडाई अनिवार्य नहीं है. और ना ही इस में व्यक्तिगत हिंसा का कोई स्थान है. केवल बम और पिस्टल इंक़लाब नहीं ला सकते. क्रांति से अभिप्राय अन्याय पर आधारित मौजूदा व्यवस्था में आमूल चुल परिवर्तन है.क्रन्तिकारी आन्दोलन को मिलने वाले आपार जनसमर्थन का प्रमुख कारण भगत सिंह की कलम से निकले विचार थे, जिसे आम जनता ने स्वीकार किया. उन्होंने ग़दर पार्टी और बब्बर आकाली के शहीदों की जीवनी लिखी जो पंजाब से प्रकाशित " कीरति" नामक पत्रिका में छपती थी. सरदार करतार सिंह सराभा को अपना आदर्श मानने वाले भगत सिंह द्वारा लिखे गए लेख और पत्रों से उनके उच्च श्रेणी के लेखक होने का पता चलता है. उनके द्वारा लिखे गए निबंध " मैं नास्तिक क्यों हूँ?, बम का दर्शन, सम्पर्दायिक दंगे और उनका इलाज" आदि अदितीये हैं. भगत सिंह द्वारा जेल में लिखी गयी पुस्तके १. समाजवाद के अर्थ २. आत्मकथा ३. भारत में क्रन्तिकारी आन्दोलन का इतिहास ४. मौत के दरवाजे पर आदि नष्ट हो चुकी है. ये पुस्तके उन्होंने अपने मित्र के पास चोरी छिपे जेल से भेजी थी लेकिन अंग्रेजो ने इन्हें नष्ट कर दिया.भगत सिंह अध्ययन और संघर्ष की बेजोड़ मिसाल थे. हमारा भारत १५ अगस्त १९४७ को आजाद हो गया था परन्तु जिस शोषण मुक्त समाज का सपना भगत सिंह ने देखा वो आज भी एक सपना ही है . वर्तमान में जब एक तरफ देश आर्थिक गुलामी की तरफ बढ़ रहा है वहीँ दूसरी तरफ सांप्रदायिकता ताकते देश की एकता को चुनोती दे रही है . ऐसे माहोल में भगत सिंह के विचार आज भी उतने ही सार्थक है जितने आजादी से पहले थे . भगत सिंह के विचार नौजवानों को प्रेरणा देते हुए कहते है की वे जनवाद तथा समाजवाद की स्थापना के लिए कृत संकल्प होकर आगे बड़े और ऐसे समाज की स्थापना करे जहाँ सभी को समान दर्जा मिले और अमीर गरीब, जात पात , उंच नीच का भेद समाप्त हो जाये.
दीप कुमार कालरा
जनवाद तथा समाजवाद की स्थापना के लिए कृत संकल्प होकर आगे बड़े और ऐसे समाज की स्थापना करे जहाँ सभी को समान दर्जा मिले और अमीर गरीब, जात पात , उंच नीच का भेद समाप्त हो जाये.nice
ReplyDeleteलिखने में हुई गलतियो के लिए कृपा मुझे क्षमा करे, और मुझे बताये की मैं इसे कैसे और ज्यादा अच्छा लिख सकता था.
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